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बतौर अभिनेता अनिल कपूर ने अपने करियर में गंभीर और हल्की-फुल्की फिल्मों के बीच सांमजस्य बनाए रखा है। एक ओर जहाँ वे ‘तेजाब’, ‘राम-लखन’ और ‘रखवाला’ जैसी फिल्में करते रहे, वहीं दूसरी ओर ‘लम्हे’, ‘ईश्वर’ और ‘विरासत’ जैसी फिल्मों में नजर आए।

इस समय अनिल के करियर में एक ठहराव आ गया है। वे बेमतलब की भूमिका करने के बजाय घर बैठना पसंद करते हैं। इन दिनों उनकी बेटी सोनम ‘साँवरिया’ से अपने फिल्मी करियर का आगाज कर रही हैं। अनिल उनकी मदद करने के साथ-साथ फिल्म निर्माता भी बन गए हैं।

यूँ तो अनिल ने साझेदारी में दो-तीन फिल्में बनाई हैं, लेकिन स्वतंत्र रूप से वे पहली बार इस मैदान में उतरे हैं। ‘गाँधी माय फादर’ जैसी गंभीर फिल्म बनाकर अनिल ने फिल्म माध्यम के प्रति अपना प्यार जताया है। वे हमेशा से अच्छी फिल्मों के प्रशंसक रहे हैं।

इस फिल्म में महात्मा गाँधी और उनके बेटे हरीलाल के संबंधों को दिखाया है। जब अनिल को इस फिल्म के निर्देशक फिरोज खान ने कहानी सुनाई तो उन्हें बेहद पसंद आई। अनिल ने अपने परिवार के साथ बैठकर अगले दिन फिर से कहानी सुनी। कहानी सुनकर सबकी आँखों से आँसू आ गए। सभी इस बात से एकमत थे कि इस कहानी पर फिल्म जरूर बनाई जानी चाहिए। अनिल ने फिल्म के व्यावसायिक मूल्यों की अनदेखी कर अपने दिल की बात मानी और फिल्म बना डाली। अनिल उसूलों के पक्के हैं। जब उन्होंने देखा कि इस फिल्म में उनके लिए कोई गुँजाइश नहीं है तो उन्होंने निर्माता बने रहना ही उचित समझा।

अक्षय खन्ना ने इस फिल्म में हरीलाल का किरदार निभाया है। अनिल के मुताबिक अक्षय के अलावा इस रोल को कोई और नहीं निभा सकता था। अक्षय के काम से वे बेहद खुश हैं और उन्होंने अपनी आगामी फिल्म के लिए भी अक्षय को चुन लिया है।

यह फिल्म काफी अरसे से बनकर तैयार है। इसके प्रदर्शन में देरी की वजह बताते हुए अनिल कहते हैं कि जब यह फिल्म बनकर तैयार हुई तब ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ भी प्रदर्शित हुई थी। उस फिल्म का विषय भी गाँधीजी पर आधारित था। इसलिए इस फिल्म का प्रदर्शन आगे खिसका दिया।

अनिल का कहना है कि फिल्म चले या न चले उन्होंने यह फिल्म अपने दिल से बनाई है और उन्हें इस बात की सबसे ज्यादा खुशी है।

Source : http://content.msn.co.in/Hindi/Entertainment/Articles/20-07-07anilkapoor.htm

 




One Response to “अनिल की गाँधी माय फादर”

  1. 1
    उन्मुक्त Says:

    हिन्दी में इतनी अच्छी समीक्षा की है। हिन्दी में और भी क्यों नहीं लिखते।

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